Vasudhaiva Kutumbakam
यूजीसी मान्यता प्राप्त मालवीय मिशन टीचर ट्रेनिंग सेंटर की ओर से शिक्षा, मनोविज्ञान तथा कला संकाय, महाराजा सयाजी राव बड़ौदा विश्वविद्यालय, वडोदरा (गुजरात) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित गुजरात के हिंदी, सिंधी, मराठी, रशियन, अंग्रेजी, संस्कृत, शिक्षाशास्त्र, गुजराती, पुस्तकालय विज्ञान, पुरातत्त्व एवं इतिहास, हिंदू अध्ययन, रक्षा अध्ययन, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र आदि विषयों के सहायक प्रोफेसर्स हेतु आयोजित पुनश्चचर्या पाठ्यक्रम (Refresher Course) में विषय विशेषज्ञ के रूप में दसवें दिन क्रमशः ‘बाल साहित्य और वसुधैवकुटुंबकम‘ तथा ‘वसुधैवकुटुंबकम में साहित्य एवं अनुवाद की भूमिका’ विषय पर क्रमशः प्रो चमोला ने दो धाराप्रवाह व्याख्यान दिए । दोनों व्याख्यानों में श्रोता मंत्रमुग्ध ही नहीं हुए अपितु भावविभोर हो रो पड़े ।
‘बाल साहित्य और वसुधैवकुटुंबकम’ पर बोलते हुए इन्होंने ‘महोपनिषद के अध्याय – 4 से ‘अयम निज परो वेति गणना लघु चेतसाम।
उदारचरितानाम तु वसुधैव कुटुंबकम’ से अपनी बात पर प्रारंभ कर ऋग्वेद की ऋचाओं ‘भूमि माता है, मैं उसका पुत्र हूं ।’ कहकर महाकवि भवभूति के ‘उत्तर रामचरितम’ में वर्णित 16 माताओं तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण की 16 माताओं का वर्णन किया। ‘दुर्गा सप्तशती’ में जिसे दसों दिशाओं की रक्षिका बताया गया है, का विस्तार से वर्णन किया है। लोक जीवन में भी षोडष मातृकाओं के पूजन का विधान बताया गया है । यह संपूर्ण वसुंधरा एक परिवार है जो मानवीय एकता, पारस्परिक भाईचारा तथा जीवन अस्तित्व के संवर्द्धन-संरक्षण हेतु अनेक प्रकार की चुनौतियों तथा सांस्कृतिक विभाजनों को मिटाकर एक दूसरे में मानवीय मूल्यों के संरक्षण हेतु प्रतिबद्ध है। बाल साहित्य चरित्र निर्माण और संस्कारों की प्रमुख आधारशिला है। बचपन में मिले संस्कार और ज्ञान जीवन भर उसके व्यक्तित्व चरित्र और मूल्यों का निर्माण करता हुआ उसके व्यक्तित्व को परिष्कृत करता रहता है जो परिवार समाज राष्ट्र व विश्व की कल्याण में उत्प्रेरक सिद्ध होता है ।कालांतर से ही नहीं, आज के युग में भी साहित्य और अनुवाद वैश्विक एकता, मूल्य संवर्धन एवं राष्ट्रसेवकों में जीवन मूल्य और चारित्रिक संजीवनी के प्रसार में प्राण तत्त्व का कार्य करते हैं । कई मार्मिक व प्रामाणिक दृष्टांतों के माध्यम से प्रो. चमोला ने अपने व्याख्यानों की प्रभविष्णुता एवं उपादेयता सिद्ध की ।
अंत में उपस्थित प्रतिभागियों ने अत्यंत भावपूर्ण दोनों व्याख्यानों पर कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए उनसे संबंधित अपने जिज्ञासापूर्ण प्रश्न पूछे जिनके समुचित प्रामाणिक उत्तर दे दिए गए । गुजरात प्रांत के एक बड़े, प्रसिद्ध व प्राचीन विश्वविद्यालय की विद्वत-श्रृंखला का अंग बनना गौरवपूर्ण लगा ।
ध्यातव्य है विगत साढ़े चार दशकों से देश-विदेश में अपने रचनात्मक लेखन व उत्प्रेरक व्याख्यानों के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले प्रो. दिनेश चमोला ‘शलेश’ का जन्म जनवरी, 14 जनवरी, 1964 को उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जनपद के ग्राम कौशलपुर में स्वर्गीय पं. चिंतामणि चमोला ज्योतिषी एवं माहेश्वरी देवी चमोला के घर में हुआ। शिक्षा में प्राप्त कीर्तिमानों यथा एम.ए. अंग्रेजी, प्रभाकर; एम.ए. (स्वर्ण पदक प्राप्त), पीएच-डी. तथा डी.लिट्. के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में भी राष्ट्रव्यापी पहचान निर्मित की है। अभी तक प्रो. चमोला ने उपन्यास, कहानी, दोहा, कविता, एकांकी, बाल साहित्य, समीक्षा, शब्दकोश, अनुवाद, व्यंग्य, लघुकथा, साक्षात्कार, स्तंभ लेखन के साथ-साथ साहित्य की विविध विधाओं में सात दर्जन से अधिक पुस्तकों में लेखन किया है । आपके व्यापक मौलिक साहित्य देश के अनेक विश्वविद्यालयों में पीएच-डी.तथा एम.फिल. स्तरीय कई शोध कार्य संपन्न हो चुके हैं तथा अनेक विश्वविद्यालयों में वर्तमान में चल रहे हैं।
अभी तक अपनी उत्कृष्ट साहित्यिक सेवाओं के लिए आपको देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा ‘सहित्यश्री’, ‘साहित्य भास्कर’, ‘विद्यासागर’, ‘युवा साहित्यकार सम्मान’, ‘साहित्य शिरोमणि सम्मान’, ‘उत्तरांचल रत्न सम्मान’ , ‘डॉ. गोविंद चातक सम्मान’, ‘उत्तराखंड शोध संस्थान सम्मान’, ‘बाल साहित्यकार सम्मान’ ‘संपादक शिरोमणि सम्मान’, ‘उत्कृष्ट बाल साहित्य पुरस्कार’, ‘हिंदी गौरव सम्मान’, ‘राष्ट्रीय राजभाषा शील्ड सम्मान’, ‘हिंदी भूषण सम्मान’, पंडित शिव शंकर दुबे स्मृति पुरस्कार’, ‘चंद्र कुंवर बर्त्वाल सम्मान’,’ परमार पुरस्कार’, तुरशन पाल पाठक बाल विज्ञान लेखन पुरस्कार’, ‘विवेकानंद सम्मान’, ‘राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान’, श्री श्याम सुधा परिमार्जन बाल साहित्य सम्मान’, ‘बाल साहित्य पुरस्कार’ (साहित्य अकादमी), ‘डॉ. राम जिनका किंकर सम्मान’, ‘डॉ. राष्ट्रबंधु सम्मान’ आदि अनेक सम्मान/पुरस्कार’ प्राप्त हुए हैं ।
आपकी चर्चित पुस्तकों में ‘यादों के खंडहर, ‘संपूर्ण कहानियां’, ‘टुकडा-टुकड़ा संघर्ष, ‘प्रतिनिधि बाल कहानियां, ‘श्रेष्ठ बाल कहानियां, ‘दादी की कहानियां¸ नानी की कहानियां, माटी का कर्ज, ‘स्मृतियों का पहाड़, ‘क्षितिज के उस पार, ‘कि भोर हो गई, ‘कान्हा की बांसुरी, ’मिस्टर एम॰ डैनी एवं अन्य कहानियाँ, ‘एक था रॉबिन, ‘पर्यावरण बचाओ, ‘नन्हे प्रकाशदीप’, ‘एक सौ एक बालगीत, ’मेरी इक्यावन बाल कहानियाँ, ‘बौगलु माटु त….,‘विदाई, ‘अनुवाद और अनुप्रयोग, ‘प्रयोजनमूलक प्रशासनिक हिंदी, ‘झूठ से लूट’, व मिट्टी का संसार’; ‘गायें गीत ज्ञान विज्ञान के’ ‘मेरी 51 विज्ञान कविताएँ’, ‘बुलंद हौसले’ तथा ‘व्यावहारिक राजभाषा शब्दकोश’ आदि प्रमुख हैं। आपके संपादन में प्रकाशित बहुचर्चित हिंदी पत्रिका ‘ विकल्प’ ने राष्ट्रीय स्तर पर अपने महत्वपूर्ण विशेषांकों के माध्यम से अपनी अलग पहचान अर्जित की है। डॉ॰ चमोला ने भारत सरकार में संयुक्त निदेशक (हिंदी) सहित विभिन्न सरकारी पदों पर कार्य किया है तथा पूर्व में आप भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, देहरादून में राजभाषा के प्रमुख रहे हैं तथा वर्तमान में उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार में आधुनिक ज्ञान विज्ञान संकाय के पूर्व डीन, कुलानुशासक तथा भाषा एवं आधुनिक ज्ञान विज्ञान के अध्यक्ष रहे हैं ।
डॉ॰ चमोला ने देश के शताधिक विद्वानों के साक्षात्कार लिए हैं। अपने अनेक साक्षात्कार, रचनाओं का प्रसारण देश के 8 दूरदर्शन केंद्रों तथा 12 आकाशवाणी केंद्रों से प्रसारित हुए हैं । आप देश-विदेश की सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं के स्थापित लेखक हैं।
आपके उपन्यास ‘टुकड़ा-टुकड़ा संघर्ष’ का कन्नड़ भाषा तथा अनेक रचनाओं का विभिन्न भारतीय देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद एवं प्रकाशन हुआ।
